फिल्म समीक्षा | कैसी है ये 'हमारी अधूरी कहानी'

Film Review | Hamari Adhuri Kahani
Film Review | Hamari Adhuri Kahani
क्यों हिंदी फिल्मों में 'हमारी अधूरी कहानी' मर कर ही पूरी होती है? क्यों हमारे यहां प्यार जीते जी हासिल नहीं होता? क्यों प्रेमियों के चेहरे पर मुस्कुराहट मरने के बाद ही आती है? सबसे बड़ा सवाल के क्यों प्रेमी मरने के लिए हर पल तैयार रहते हैं? मोहित सूरी की 'हमारी अधूरी कहानी' एक बार फिर उसी स्टीरियोटाइप को स्थापित करने की कोशिश करती है कि हमारे देश में प्रेम और प्रेमी परंपराओं के बंधनों में बंधे हुए हैं और उन्हें प्रेम को हासिल करने के लिए मौत को गले लगाना ही होगा।  यही नहीं उनकी आत्माएं तभी मिलती हैं जब दोनों प्रेमियों के अवशेष एक ही जगह पर मिलते हैं। इक्कसवीं सदी में प्रेम चाहे टवीटर और वट्स एप में सिमट गया है। प्रेमियों और प्रेम के मिलन के लिए साधन और संभावनाएं बढ़ गई हैं। प्रेमी को प्रेमिका की एक झलक पाने के लिए अब कई दिन इंतज़ार नहीं करना पड़ता, जब दिल किया तभी तुरंत ताज़ा तस्वीर और लाइव वीडियो शेयर हो जाती है। मोहित सूरी के प्रेमी भी इसी तरह प्रेम करते हैं, लेकिन उनका मिलन कई दशकों पुराने अंदाज़ में अस्थि विसर्जन के बाद ही होता है।



महेश भट्ट ने अपनी कहानी में अपने दौर की परंपराओं और नए दौर की हाई टैक मोहब्बत को गढऩे की कोशिश की है, जिसमें वसूधा (विद्या बालन) एक पांच साल के बच्चे की मां है, जिसका पति (राजकुमार राओ) कहीं गायब हो गया है। अपनी उम्र जितना लंबा इंतज़ार कर चुके बच्चे को वह पापा के लौट आने का झूठा दिलासा देती रहती है। परिवार के दबाव में की गई शादी के दिन पहनाए गए मंगलसूत्र और अगले ही दिन ज़ब्रदस्ती हाथ पर गुदवाए गए पति के नाम से पांच साल तक वह आस की डोर बांधे रखती है। पति के इंतज़ार में नौकरी कर बच्चे का भविष्य संवारने में जुटी रहती है। अचानक एक दिन उम्मीद की यह डोर भी टूट जाती है, जब उसके खोए हुए पति का नाम पुलिस की मोस्ट वाटेंड लिस्ट में होने का पता चलता है।  अभी वह अपने आप को संभाल भी नहीं पा रही होती कि सावन की बारिश की तरह होटेलियर आरव (इमरान हाशमी) आता है। अपने बुरे दिनों के दर्द को पैसों के झाड़ू से समेटने की कशमकश में ज़िंदगी जीना भूल चुके आरव को वक्त के कांटों से घिरी विद्या की फूलों सी खुशबू फिर से जीने की उम्मीद दे जाती है। थोड़ी ऊहापोह के बाद जब दोनों ज़िंदगी की ऊंगली थामने को तैयार होते हैं तो वसूधा का अतीत फिर काला साया बन कर सामने खड़ा हो जाता है। पर्त दर पर्त ऐसे राज़ खुलते हैं, जिनके ज़रिए मोहित सूरी नक्सलवाद, राजनीति और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर्दे पर उतारते हैं। हालात से जूझती वसूधा के ज़रिए मोहित बीच-बीच में नारी के अस्तित्व से जुड़े सवालों को भी छूते हैं और नारी मुक्ती के ख़्याल भर से ही बौखलाए मर्दाना समाज को राजकुमार राओ के रूप में दिखाते हैं।  परंपरागत मां का बेटी को मर्यादाएं तोड़ कर आज़ाद हो जाने की नसीहत देना और अंत तक आते-आते विद्या का खुद प्रतीकों के बंधन छोड़ कर आगे बढ़ जाने का संकल्प नई दौर की नारी को परिभाषित करते हैं।



मोहित सूरी की इस प्रेम कहानी में जो नारीवाद की झलक है, वह प्रेम कहानी में एक नया टविस्ट कही जा सकती है।  पुरानी कहानियों में प्रेमिका अपने पिता, भाई या पति को नारी पर लदी भारी भरकम परंपराओं का बखान नहीं करती थी, सूरी की प्रेम कहानी में प्रेमिका ही नहीं बल्कि उसकी मां भी नायिका को अपने खो चुके पति के मंगलसुत्र की कैद से निकल कर नई प्रेम कहानी बुनने की सलाह देती है। खोया हुआ परंपरागत पति जब लौट कर उसे वापिस हासिल करने की जब्रदस्ती कोशिश करता है तो वह उसे आज़ाद हो चुकी नारी के आक्रोश से रूबरू करवाती है। पति की बौखालहट में मोहित सूरी मर्द प्रधान समाज की बौखलाट को दिखाता है। इस बौखलाहट की अति को राओ बखूबी पर्दे पर उतारता है। इस कशमकश में पिसती, बंटती और फिर आज़ाद होती विद्या बालन नए दौर की नारी का प्रतीक बन कर उभरती है। मोहित सूरी की फिल्म में बस यही एक खूबसूरती है कि उन्होंने घिसी पिटी कहानी को तेज़ी और खूबसूरती से पेश करने की भरपूर कोशिश की है और काफी हद तक सफल हुए हैं। बहुत हद तक हर हिंदी फिल्म की तरह हमारी अधूरी कहानी भी पूरी तरह से प्रिडिक्टेबल है। अगर दर्शक को कुछ बांधे रखता है तो वह विद्या, इमरान हाशमी और राजू राओ के एक्सप्रैशन्स और भावनाओं का आदान-प्रदान हैं। फिल्म को रफ्तार देने के लिए डायरेक्टर ने इमरान को पूरी कहानी में लगातार सफर करते हुए दिखाया है। इससे सिनेमेटोग्राफर विष्णू राओ को खूबसूरत लोकेशन्स एक्सपलोर करने का काफी मौका मिला है, जिसे उन्होंने बखूबी भुनाया है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि इमरान हाशमी कलकत्ता, दुबई, मुंबई, शिमला जहां भी जाते है, हर जगह एयरपोर्ट, एयरपोर्ट स्टाफ और एयरपोर्ट पर लगे हुए फूल एक जैसे ही क्यों होते है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह कहीं भी जाने के लिए पहले अपने पसंदीदा एयरपोर्ट वाले शहर आते है? सैंकड़ों होटलों का मालिक कुछ भी कर सकता है, भाई। यह भी समझना मुश्किल था कि लेंड माईन लगाने के बावजूद फूलों का पूरा खेत कैसे खिला रहा या इतने घने फूलों के खेत को बिना खोदे लैंडमाइन बिछाए कैसे गए? लैंडमाईन बिछे हुए इलाके के पास चेतावनी भी लिख कर लगाई जाती है, यह भी मैंने पहली बार जाना। फिर भला इन लैंड माईन में जाएगा कौन? कोई पागल प्रेमी ही जाएगा, हैं जी।




फिल्म का संगीत ठीक-ठाक है और कहानी को कंपलीमेंट करता है। कोई गीत ठूंसा हुआ नहीं लगता। संगीत के अलावा प्रेम कहानी में सबसे अहम भूमिका निभाते वाले डॉयलॉग, शगुफता रफीक ने बखूबी लिखे है। प्रेम के फलसफे को फिल्मी अंदाज़ में पेश करते हुए भी उनके संवादों में मुहब्बत की नफासत झलकती है और कई जगह वह कविता हो जाते हैं। इस फिल्म को जो भी रेटिंग मिलेगी, वह उनके डॉयलॉग और तीनों मुख्य कलाकारों की अदाकारी के लिए ही हैं। एक रिकार्ड भी बनाती है यह फिल्म, पहली बार इमरान हाशमी ने इस फिल्म में सीरियल किस्सर वाली इमेज तोड़ी है। अगर आप प्रेम कहानियों के डाई हार्ड फैन हैं और आपका 'दिल अगर बच्चा है जी' तो इन सब बातों के लिए एक बार यह फिल्म देखी जा सकती है।

-दीप जगदीप सिंह

हमें तो स्टार चाहीए, सेहत जाए भाड़ में



मैगी की मिलावट के मुद्दे ने यह चर्चा छेड़ दी है कि ब्रांडेड उत्पाद सभी नियम कानूनों को धत्ता बता कर मनमानी करते फिरते हैं और लोगों की सेहत की एेवज में मोटा माल कमा रहे हैं। इसके साथ ही मैगी के स्टार प्रचारकों को भी कटघरे में खड़ा किए जाने को लेकर चर्चा छिड़ गई है, जाे इस मोटे माल में 'हिस्सेदार' हैं। कुछ प्रचारकों के हक में हैं तो कुछ उनको सज़ा दिलाने के हक में। कुछ यह भी मान रहें हैं कि हाे-हल्ला सितारों तक सिमट के रह जाएगा और असली मुद्दा खो जाएगा।
maggi padegi mehangi/मैगी पड़ेगी महंगी

इस बात पर भी माथा खुरचा जा रहा है कि अाखिर अचानक मैगी पर ताबड़ताेड़ छापेमारी हाेने की वजह क्या है, इसके पीछे की राजनीति क्या है? बाकी नूड्लस उत्पाद और अन्य पैकेजड खाद्य उत्पाद कब इस जांच के घेरे में अाएंगे? अाएंगे भी या नहीं? सवाल बहुत से हैं। लेकिन एक अहम सवाल जो सितारों की नैतिकता से जुड़ा है और हम सब भुक्तभोगियों की भी नैतिकता से जुड़ा है, बड़े बड़े सवालों की भीड़ में यह मामलूी सा सवाल कहीं खो कर ना रह जाए सो उसे छूने की कोशिश कर रहा हूं।

मुझे दूसरों का पता नहीं, पर मैं यह जानता हूं अनैतिकता को अनैतिकता कहना मेरी ज़िम्मेदारी है। हम सब की है। मैगी की नैतिक जिम्मेदारी सबसे बड़ी है, जिसने मुनाफे के लालच में लोगों की सेहत और ज़िंदगी से खिलवाड़ किया है। उन लोगों की भी है, जिन्होंने पैसे के लालच और अपनी इमेज को कैश करके मुंह मांगे दाम कमाए हैं। लोगों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि कोई चीज़ खाने और ख़रीदने से पहले वह पता करें कि उसमें क्या है। भारत जैसे अनपढ़ देश में यह श्रद्धा की चर्म सीमा ही है कि हमारे यहां लोगों को 'स्वाद भी सेहत भी' कहना काफी है किसी उत्पाद को बेचने के लिए।

बात केवल सेलीब्रेटीज़ से ना शुरू हुई थी ना उन पर ही खत्म होगी। सेलीब्रेटीज़ की बात कर ही कौन रहा है, सिर्फ उनके फैन्स वर्ना कानून तों उनको क्राइम में पार्टी की ही तरह डील कर रहा है, साेशल मीडिया पर लोग क्याें हाे हल्ला मचा रहे हैं। हर सेलीब्रिटी ने एेड् से करोड़ों रूपए कमाएं हैं, अपने बचाव के लिए उनके पास वकील हैं, उनका खरीदा हुअा मीडिया है। सबसे बड़ी समस्या उनके भ्रमित और मोहित फैन्स हैं, जो बिना चीज़ों को गहराई से जाने बस अन्ध भक्ति में उनका पक्ष लेने लग जाते हैं।


सलमान ख़ान के मामले में क्या हुअा, पहले तो फैन्स उसकी सज़ा पर राेने लगे, प्रथार्नाएं करने लगे। लेकिन अगले ही दिन उसने पैसे और पहुंच के दम पर कानून काे 'कोठे' की चीज़ बना डाला। तब क्यों नहीं राेया कोई। कानून की माैत पर रोना क्यों नहीं अाया किसी को। जब कोई मुहल्ले का गुंडा किसी की बहन बेटी को परेशान करेगा और थाने में आपकी बात नहीं सुनी जाएगी, तब सलमान खान अाएगा दराेगा को अापके हक में करने के लिए। आप खुद ही एक स्टार की भक्ति में पैसे के सामने कानून को छोटा होते देख कर खुश हो रहे हैं। कल को जब आपके पास कानून खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा तब आप ही कहेंगे कि कानून सिर्फ पैसे वालों का है। फिर आप भी कानून को खरीदने के लिए अंधाधुंध पैसा कमाने लग जाएंगे बजाए यह सोचे कि अगर कानून सब के लिए बराबर हो जाए तो पैसे की ज़रूरत ही खत्म हो जाएगी। जितना हल्ला उसको सज़ा मिलने पर मचा, अगर उतना उसकी ज़मानत होने पर मचा होता तो अाज उसकी नियति भी कुछ और होती और लोंगों का भी कानून में विश्र्वास बढ़ता, लेकिन हमें क्या हमें क्या हमें तो स्टार चाहीए, कानून जाए भाड़ में। हमें तो मैगी चाहिए, सेहत जाए भाड़ में।

यह सेलीब्रिटी भी इंसान ही होते हैं और हम सभी की तरह गल्तियां करते हैं, बल्कि पैसे के लालच और शाेहरत के दंभ में हमसे ज़्यादा करते हैं।


अगर आप को लग रहा है कि इस हो हल्ले में बाकी उत्पाद बच जाएंगे तो अभी से आप उनको खरीदना बंद करीए। कोई इसका कारण पूछे तों उन्हें असलियत बताईए। जब कंपनियों का माल गोदामों में सड़ेगा तो अपने आप हो-हल्ला मचेगा उनके बारे में भी। नैतिक जिम्मेदारी सभी की है, सितारों की सबसे ज़्यादा है। जिनको वह अपनी फिल्मों के टिकट बेच कर सितारा बनते हैं कम से कम उनकी सेहत से खिलवाड़ करने में मुनाफाख़ाेर कंपिनयों का साथ देना और यह जानते हुए भी की उनके देश की जनता भोली है, उन्हें बेवकूफ बनाना उनको कभी तो इसके लिए दंड भुगतना होगा।

लेकिन आप दंड क्यों भुगतते हैं, देख कर खाईए क्या खा रहे हैं। खाकर देखते रहेंगे तो देखने लायक नहीं रहेंगे।

-दीप जगदीप सिंह