ये कैसी 'टशन'


साल की चिर प्रतिक्षित फिल्म के लिए अगर ये कहें कि 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया' तो गल्त न होगा। भोजपुरिया डॉन से बदला लेने निकली उसके पूर्व बॉस की बेटी की कहानी 70 के दशक की फिल्मों की याद करवाती है। बेमतलब का एक्शन और ढांय ढांय कहानी में जान नहीं डाल पाती। बचपन की मोहब्बत की कहानी (करीना-अक्षय कुमार) और डॉन की गैंग में घुस कर उसके 25 करोड़ रुपए उड़ाकर बदला लेना अब लोगों को नहीं पचता। पहले हाफ में तो लोग कहानी की तलाश में सिर पकड़ लेते हैं। कॉल सेंटर में काम करने वाला और इंगलिश टीचर सैफ अली खान अपनी शुरूआती फिल्मों की तरह आशिक मिज़ाज है, जो हर रोज़ नई गर्ल फ्रेंड की तलाश में रहता है। (काश डायरेक्टर साहब ने उनकी ऐसी पुरानी फिल्मों का हश्र ध्यान में रखा होता) एक दिन उनकी मुलाकात भोली भाली सीधी सादी करीना से होती है। करीना के चक्कर में फंस सैफ, डॉन 'भैया जी' यानि अनिल कपूर को अंग्रेजी सिखाने पहुंचता है। अदाओं को प्यार समझ धोखे के जाल में फंस कर सैफ करीना संग मिलके डॉन के 25 करोड़ उड़ा लेता है। लेकिन भई आज के ज़माने की हिरोईन और डॉन की पीए क्या सचमुच भोली भाली होगी? सो वो पैसे लेकर रफू चक्कर और अपने सैफ मियां बलि के बकरे बन जाते हैं। तभी एंट्री होती है जनाब बच्चन पांडे (अक्षय कुमार) की जो भैया जी के भक्त हैं और उनके नक्शे कदम पर चलते हुए डॉनगिरी में नाम कमाना चाहते हैं। न जाने हमारे फिल्मकारों को क्या हो गया है। यही जताने पर तुले हैं, आज कल के युवाओं के रोल मॉडल बस गुंडे ही हैं। कुछ हफ्ते पहले रिलीज हुई वन टू थ्री में तुषार का किरदार भी कुछ ऐसा ही था। खैर अब सैफ बच्चन की कस्टडी में है और करीना को ढूंढ कर लाने पर ही उसकी जान बख्शी जा सकती है। अक्षय कुमार पहले हाफ के मध्य में एंट्री के बाद फिल्म को पूरी तरह अपने कंधों पर उठा लेते, लेकिन बिना कहानी के हीरो फिल्म में जान नहीं डाल सकता। एक्शन के अलावा करीना को शादी के लिए प्रपोज करने की सलाह सैफ से लेने वाले सीन में अक्षय की एक्टिंग बेहद शानदार है। अनिल कपूर के भोजपुरी स्टाइल में हिंगलिश बोलना अखरता है। डायलाग समझने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। दीवार के अमिताभ का इंगलिश स्टाइल कॉपी करने के चक्कर में वह अपने कैरेक्टर को बर्बाद कर गए, लेकिन एक्टिंग के मामले में उनका कोई सानी नहीं। करीना भी अपने रोल में सटीक बैठी हैं।
खास कर उनका सीधी साधी लडक़ी से ग्लैमर डॉल बनते ही समंदर से निकलते हुए 5 सैकेंड का बिकिनी शो, लेकिन बॉक्स आफिस पर ये शो कितनी भीड़ जुटा पाता है कहना मुश्किल है। सैकेंड हाफ में गोलियों की बारिश में अकेले अक्षय का मजे से लडऩा और हाथ पर गोली लगने के बाद अगले ही सीन में वह करीना के बदन पर उसी हाथ को फिरा कर इश्क फरमाते नजर आते हैं और खरोंच एक भी नहीं।
डायरेक्टर साहब ने 70 के दशक का प्लाट तो उठा लिया, लेकिन ये भूल गए शायद कि उन दिनों अगर हीरो के गोली गले, तो हीरोईन चाकू गर्म कर उसे निकाल कर पट्टी करती है, ही ही ही।। कानपुर का बच्चन सिंह जो मुश्किल से भोजपुरी अंदाज में हिंदी बोल पाता है, अचानक उर्दू लफ्जों वाले गीत फलक तक ले चल भी... गाने लगता है। वाह! डायरेक्टर साहब। फिल्म से बतौर डायरेक्टर विजय कृष्णा आचार्य बढ़ीया स्टार कास्ट के बावजूद कहानी के मामले में चूक गए। विशाल-शेखर का म्यूजिक भी निराश करता है। पंजाब के उदास गीतों का बादशाह सलीम का गाया टाइटल ट्रैक भी पूरे झमेले में कहीं खोकर रह गया।
यश राज से पीवीआर की मुनाफा बंटवारे को लेकर चल रही 'टशन' के चलते पीवीआर सहित कई मल्टीपलैक्स में फिल्म नहीं लग सकी। यश राज बैनर, कहानी को गुप्त रखने के चलते बढ़ी उत्सुकता और आज कल बाक्स आफिस पर छाई हुई स्टार कास्ट भीड़ को पुराने स्टाइल के सिनेमा घरों तक खींच लाने में सफल रहे। जिन मल्टीपलैक्स में टशन लगी है, उन्होंने सारे शोस का हाउस फुल का 'टशन' (बोर्ड) भी टांग दिया पर वीक एंड तक फिल्म की हवा निकल सकती है। गैर भोजपुरी क्षेत्रों में भी फिल्म को नुकसान होगा।

Deep Jagdeep

Deep Jagdeep Singh a is Poet, Columnist, Screen Writer, Lyricist and Film Critic. He writes in Punjabi, English and Hindi Google

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